Jab Chudi Huyi Choot Ki Sikayi-3
Jab Chudi Huyi Choot Ki Sikayi-3

  Jab Chudi Huyi Choot Ki Sikayi-1

अभी तक आपने पढ़ा कि मेरी चुदी हुई चूत की सिकाई पहले मैंने की, फिर मेरे यार मोहित ने गाड़ी में अपने होठों से उसको सेंका। लेकिन सेंकते-सेंकते इतना मज़ा दे दिया उसने कि मैं खुद ही उसके लिंग से दोबारा चुदने के लिए तड़प गई। मगर जहां मज़ा होता है, वहां सज़ा ना मिले, ऐसा कभी होते देखा है … .? और फिर मैं ठहरी हरियाणा की छोरी। बात भला छिपी कैसे रहती … .कहानी में आगे क्या हुआ, आप अंजू की शब्दावली में ही सुनें …

उस दिन गाड़ी में हुई चुदाई के बाद मोहित मेरी योनि में झड़ गया तो मैंने उसे उठने के लिए कहा।
वो उठा और मैंने यहां-वहां देखा कि कोई देख तो नहीं रहा था हमें। मैंने अपना शर्ट नीचे किया और अपनी पैंटी ऊपर करके पजामी पहनने लगी। मोहित अपने सिकुड़े हुए लिंग को अपनी जिप के अंदर डालकर जिप को बंद करने लगा।

तब तक मैंने भी खुद को व्यवस्थित किया और वो आस-पास देखते हुए गाड़ी से उतर गया। बिना कुछ बोले उसने गाड़ी स्टार्ट की और 3-4 मिनट बाद गांव की सीमा में दाखिल होने के बाद मैंने गांव से लगभग किलोमीटर भर की दूरी पर गाड़ी रुकवा ली।

मैंने दुपट्टे को सिर पर ढका और किताबों को छाती में दबाकर गांव में अंदर की तरफ बढ़ने लगी। मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी कि मैं नज़र उठाकर यहां-वहां भी देख लूं। बस गाड़ी के वापस जाने की आवाज़ मुझे सुनाई दी और उसके बाद ठंडी अंधेरी रात का सन्नाटा मेरे चारों ओर पसर गया। गांव छोटा ही था। क्योंकि मेरे गांव को देखकर ये कहना मुश्किल था कि गांव के बाहर खेत बने हैं या खेतों के बीच गांव बना है।

मेरा घर भी गांव के बाहरी छोर पर था। इसलिए चेहरा छिपाए चुपचाप मैं अपने गेट के अंदर दाखिल हो गई। मुड़कर गेट बंद करते हुए मैंने देखा कि टिंकू की बाइक भी पीछे-पीछे आ रुकी। एक बार तो सहमी कि कहीं मोहित पीछे-पीछे तो नहीं आ गया। मगर वो तो अभी अभी गाड़ी लेकर गया है। मैंने देखा कि टिंकू अपने गेट में अंदर चला गया।
मैं भी कितनी भुलक्कड़ हूँ।

मैंने गेट बंद किया और अंदर की तरफ मुड़ी तो माँ बाहर आती हुई दिखाई दी। मैं सहम सी गई। मेरे कुछ सफाई देने से पहले माँ ही पूछ बैठी- आज तू सपना के भाई के साथ नहीं आई क्या?
मन ही मन कहा कि अगर मोहित का ज़िक्र भी किया तो मेरी शामत आनी निश्चित है इसलिए माँ से झूठ बोलना पड़ा। मैंने कहा- नहीं माँ, आज विकाश भैया मुझे घर से थोड़ी दूर ही छोड़कर चले गए। उनको थोड़ी जल्दी थी। इसलिए बस कुछ कदम की दूरी पर छोड़ दिया मुझे।
माँ बोली- अच्छा … पहले तो कभी ऐसा नहीं करता था वो … और आज तो वैसे भी इतना अंधेरा हो गया है। उसको बोल देती कि घर के बाहर तक छोड़ दे। एक मिनट में कौन सा रेल छूटने वाली थी उसकी?

आज माँ कुछ ज्यादा ही सवाल पूछ रही थी, मुझे माँ से पीछा छुड़ाना मुश्किल हो रहा था। मैंने कहा- माँ मैं थकी हुई हूँ, चाय पी लूँ एक बार।
माँ मेरी तरफ देख रही थी, मैं नज़र झुका कर अंदर चली गई।

मैंने सोचा, यार … इस मोहित के चक्कर में मेरा कॉलेज जाना छूट ही जाएगा। अब उससे कभी बात नहीं करूंगी। ये मुझे फंसवाकर छोड़ेगा एक न एक दिन।
मगर दूसरी तरफ उससे प्यार भी करने लगी थी। लेकिन घर वालों की इज्जत ज्यादा ज़रूरी थी इसलिए उससे दूरी बनाने के सिवाय मुझे कोई दूसरा रास्ता नज़र भी नहीं आ रहा था।
गनीमत रही कि उस रात उसका कोई फोन भी नहीं आया।

अगले दिन इतवार था। कॉलेज की छुट्टी थी। रोज़ की तरह मैं सुबह जल्दी उठी और सबके लिए चाय बना दी। फिर नहा धोकर मंदिर भी हो आई। वापस आकर खाना बनाया और 9 बजे तक सबने खाना खा लिया।
माँ पड़ोस वाली काकी के यहां धूप सेंकने चली गई। और पापा गाँव के बड़े बूढ़ों के पास ताश पीटने चले गए।

मैं घर में अकेली थी। बोर होने लगी तो टीवी ऑन कर लिया। आज बहुत दिनों बाद कोई लव स्टोरी देखने का मन कर रहा था। सारे चैनल घूमकर वापस आ गई मगर कहीं कोई ढंग की फिल्म नज़र नहीं आई। फिर शुक्रवार के सीरीयल का रिपीट टेलीकास्ट देखते हुए ही टाइम पास करने लगी।

तभी फोन बजने लगा। पास में सोफे पर पड़े फोन को उठाकर देखा तो मोहित का फोन था। मेरा आज उससे बात करने का मन नहीं था मगर प्यार के हाथों मजबूर होकर फोन उठा ही लिया।
मैंने हल्लो की तो वो बोला- के कर रही है जान?
मैंने कहा- टीवी देख रही हूं!
“टीवी देखे तै के होगा, हमनै भी देख लिया कर कदे? आज तक तन्नै कदे एक बार भी फोन ना करा मेरे पास … जब करूं हूं, मैं ही करूं हूं तेरे पास … अगर तेरे को मैं पसंद ना हूं तो वैसे बता दे यार?
मैंने कहा- नहीं देवेन्द्र, ऐसा कुछ नहीं है जैसा तुम सोच रहे हो। मगर अब मैं तुमसे नहीं मिलना चाहती।
वो बोला- क्यूं? के होया यार … कुछ गलती हो गी के मेरे तै?
“नहीं यार … वो बात नहीं है!” मैंने जवाब दिया।
“फेर मिलने के लिए मना क्यूं कर रही है तू … तेरे बिना इब जी ना लागता मेरा!”

मैंने कहा- देख यार … मैं भी तुम्हें स्कूल टाइम से ही चाहती थी। मगर मैं एक लड़की हूं। अगर किसी को हमारे बारे में पता लग गया और बात मेरे घर वालों तक पहुंच गई तो मेरी जान ले लेंगे। तू समझ क्यों नहीं रहा।
वो बोला- तू हर टाइम उल्टी बात क्यूं करा करै … किसे ने क्यूं पता लागैगा पागल। हम कोए खुले आम थोड़ा ना कुछ कर रे हैं?
मैंने कहा- वो सब तो ठीक है मगर … फिर भी ऐसी बातें लोगों में बहुत जल्दी फैलती हैं, और वैसे भी मुझे लगता है कि माँ को मेरे ऊपर शक हो गया है … इसलिए हम ना ही मिलें तो बेहतर है।
तभी मेन गेट की आवाज़ हुई, मैंने चुपके से मोहित से कहा- लगता है माँ आ गई। बाद में फोन करती हूं।
मैं फोन एक तरफ रख कर टीवी देखने लगी।

मैंने माँ से कहा- आपके लिए चाय बना दूं क्या?
माँ ने मेरी बात का कोई जवाब नहीं दिया।
मैंने फिर पूछा- माँ, चाय बना दूं?
माँ ने रूखे मन से कहा- तेरे पापा को आ जाने दे, उसके बाद बना लिए। माँ का मूड अच्छा नहीं लग रहा था। लेकिन मैंने भी कुछ ज्यादा पूछने की कोशिश नहीं की।

घंटे भर बाद पापा भी आ गए। मैंने चाय बनाकर दोनों को दे दी।
शाम के 5 बजे के करीब माँ ने कहा- अंजू … आज चूल्हे का ईंधन खत्म हो गया है … जाकर गितवाड़े से ईंधन उठा के ले आ!
मैंने कहा- जाती हूं माँ।

गांव में घरों से दूर खेतों के पास भैंसो के गोबर और ईंधन के लिए लोग अपनी अलग-अलग जगह को घेर कर रखते हैं जिसे गितवाड़ा बोला जाता है। मेरे कॉलेज से पहले हम लोग भी भैंस रखते थे मगर मेरी पढ़ाई के चलते घर में काम करने वाला कोई था नहीं और माँ से अकेले काम होता नहीं था इसलिए हमने अपनी भैंस काकी को पालने के लिए दे दी थी।
मगर सर्दियों में अक्सर रोटी मिट्टी के चूल्हे पर ही बनती थी इसलिए कीकर के कांटों या अरहर के सरकंडों का प्रयोग चूल्हे में ईंधन के लिए किया जाता था। माँ ने मुझे ईंधन लाने के लिए भेज दिया।

जाते-जाते अंधेरा तो घिर ही आया था। मैंने ईंधन को इकट्ठा करके एक पुराने कपड़े में लपेट कर भरोटा(गठरी) बना ली। मगर जब उठाने लगी तो मुझसे वो उठाया नहीं गया, शायद ज्यादा भारी हो गया था।
मैंने यहां-वहां देखा कि किसी की मदद ले लूं। मगर काफी इंतज़ार करने के बाद कोई आता हुआ दिखाई नहीं दिया।

तभी खेतों की तरफ से टिंकू टहलता हुआ आ रहा था। मैंने उसको आवाज़ दी- टिंकू!
वो बोला- हां?
“अरे, एक बार यो ईंधन का भरोटा उठवा दिए आकै!”

वो कीकरों के बीच से होता हुआ मेरे पास आ गया। उसने जाड़े से बचने के लिए चादर ओढ़ रखी थी। मैंने गठरी को सिर पर रखने के लिए चुन्नी उतार ली और उसको लपेट कर गोल बना लिया ताकि गठरी को सिर पर उठाकर आसानी से ले जाया जा सके।
जब मैं चुन्नी उतार रही थी तो टिंकू मेरे वक्षों की तरफ घूर रहा था। जब मैं और वो गठरी उठाने के लिए दोनों नीचे झुके तो वो मेरे सूट के अंदर से मेरे उभारों को देखने की पूरी कोशिश कर रहा था। एक तरफ से उसने गठरी को सहारा दिया और दूसरी तरफ से मैंने गठरी उठाई और अपने सिर पर रखने ही वाली थी कि टिंकू ने मेरे वक्षों को दबा दिया।

मैंने गठरी को वहीं पर फेंका और उसके मुंह पर एक तमाचा जड़ दिया। वो ताव में आ गया और उसने मेरे हाथों को पकड़ कर मेरे वक्षों को फिर से कसकर दबा दिया।
मैंने कहा- टिंकू … तू पागल हो गया है क्या?
वो बोला- घणे नखरे क्यूं कर रही है … मन्नै तेरे और मोहित के बारे में सब कुछ बेरा है।

उसके मुंह से मोहित का नाम सुनकर मैं सन्न रह गई।
वो बोला- मन्नै सब पता कर लिया था। बस मैं अपनी आंखों से देखना चाऊं था। और जब उस दिन तू रात नै उसकी कार में से उतरी थी तो मैं यहीं खेत में घूमणे आया हुआ था। इब ज्यादा सती-सावित्री मत बण मेरे आगै …
कहकर उसने अपनी चादर उतारी और ज़मीन पर डालते हुए मुझे पकड़ लिया। मैं उसके साथ कुछ भी करने के लिए तैयार नहीं थी मगर वो मेरे और मोहित के बारे में सब कुछ जानता था इसलिए मैंने चुप रहने में ही भलाई समझी।

टिंकू ने मेरे शर्ट के ऊपर से मेरे वक्षों को मसलना शुरू कर दिया। मैं उसकी जकड़ में थी और उसकी लोअर में तना उसका लिंग मेरे पेट के आस-पास टच हो रहा था। उसने मुझे नीचे पड़ी चादर पर लेटा लिया और मेरी सलवार का नाड़ा खोलने लगा।

नाड़ा खोलकर उसने मेरी सलवार निकाल दी। घुटनों के बल बैठकर उसने अपनी लोअर का नाड़ा भी खोला और एक हाथ में शर्ट को ऊपर पकड़ते हुए दूसरे हाथ से लोअर को नीचे खींच दिया। लोअर को जांघ तक लाकर उसके नीचे पहने शार्ट्स में उसका तना हुआ लिंग मुझे सांझ के अंधेरे में भी अलग से दिखाई दे रहा था। वो घुटनों के बल बैठा था और अगले ही पल उसने अपना कच्छा भी नीचे कर दिया। उसका तना हुआ लिंग हवा में उछल गया और वो जांघों तक नंगा होकर मेरे ऊपर लेट गया। मैं भी जांघों तक नंगी थी।
उसका लिंग मेरी पैंटी फाड़कर अंदर घुसना चाहता था।

उसने मेरे वक्ष दबाते हुए नीचे ही नीचे मेरा जांघिया खींचकर मेरी योनि को नंगी कर दिया। फिर उसने एक हाथ से अपना लिंग पकड़कर मेरी योनि पर सेट करवा दिया और मेरी टांगें हल्की सी मोड़ते हुए थोड़ी खोली और एक जोर का धक्का दे मारा। उसका लिंग मेरी योनि में जा घुसा और मेरे वक्षों को दबाते हुए मुझे वहीं खुले गितवाड़े में चोदने लगा। मैं मजबूरी में उसके नीचे पड़ी हुई अपना योनि भेदन करवा रही थी।

वो किसी बेकाबू जानवर की तरह मेरे ऊपर चढ़ा हुआ था और जवानी के जोश में मेरी योनि को घायल किए जा रहा था। उसका लिंग बहुत लंबा था और जवानी का जोश कुछ ज्यादा ही उबल रहा था। उसके धक्कों के साथ मुझे लिंग अपने पेट तक पहुंचता हुआ महसूस हो रहा था।

तभी पीछे से उसकी पीठ पर एक डंडा आकर पड़ा। हम दोनों हक्के बक्के रह गए और वो उठकर खड़ा हो गया। उसके उठते ही मैंने देखा पीछे मेरी माँ खड़ी हुई थी।

मेरी जान निकल गई। माँ ने पहले टिंकू की टांगों पर तीन-चार ज़ोर के डंडे बरसाए।
“हरामजादों … यो ही देखना रह गया था इब? इतना तो सोच लेते कि तुम भाई-बहन हो!”
टिंकू ने लोअर ऊपर की और माँ के सामने गिड़गिड़ाने लगा- ताई मेरी गलती ना है, मैं तो खेत में घूमण आया था … इसने ही आवाज़ देकै मैं बुलाया था। जब मैं गठरी उठाने लगा तो ये मुझे नीचे लेकर लेट गई। मेरी कोए गलती ना है ताई … मन्नै छोड़ दे।
टिंकू ने सारा इल्ज़ाम मेरे सिर मढ़ दिया।

माँ ने मेरे बाल पकड़े और मेरी चोटी खींचकर बोली- तू तो घर चल … तेरे से तो मैं घर बात करूंगी।
सच कहूं तो उस वक्त मारे डर के सलवार में मेरा पेशाब निकल गया।
मगर जो होना था वो तो हो चुका था।

घर जाकर माँ ने मुझे कमरे में बंद करके खूब मारा। इतना मारा कि मेरी रूह तक कांप गई। माँ ने डंडों से मेरी खूब सिकाई की। मैं माँ के सामने गिड़गिड़ाने लगी। छोड़ दे माँ … टिंकू झूठ बोल रहा था, मैंने उसके साथ ऐसा कुछ नहीं किया।
वो बोली- कुलछणी … अब भी झूठ बोल रही है … तेरी काकी ने मुझे पहले ही सब बता दिया था मगर मुझे अपनी औलाद पर भरोसा था, इसलिए मैंने उसकी बात नहीं मानी। वो तो अच्छा हुआ कि आज सब कुछ मैंने अपनी आँखों से देख लिया नहीं तो तू हमें … गाँव में मुँह दिखाने लायक नहीं छोड़ती। कल से तेरा घर से बाहर निकलना बंद। हो गई तेरी पढ़ाई जितनी होनी थी। अगर तूने घर से बाहर कदम रखा तो मैं भूल जाऊंगी कि तू मेरी बेटी है।
कहकर माँ ने मुझे वहीं रोते हुए छोड़ दिया और कमरा बाहर से बंद कर दिया।

उस दिन को याद करती हूं तो आज भी मेरी रूह कांप उठती है। उस दिन के बाद मेरा घर से बाहर निकलना बंद हो गया। मेरा फोन माँ ने चूल्हे में डाल दिया और रिश्तेदारी में मेरी शादी की बात चला दी। एक महीने के अंदर ही मेरी शादी तय करवा दी गई और मार्च में मेरी शादी करके मुझे घर से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

मैं मानती हूं कि ग़लती मेरी भी थी मगर जिस समाज में मैं रहती हूं वहां लड़कियों को ही गलत समझा जाता है। इसलिए मैंने कभी इस बात को साबित करने की कोशिश नहीं की कि उस शाम टिंकू के साथ पहल मैंने नहीं की थी।
टिंकू ने मोहित और मेरे रिलेशन का फायदा उठाकर अपना उल्लू सीधा करना चाहा। लेकिन वो खुद तो डूबा ही … साथ में मुझे भी ले डूबा।

मैं मोहित के साथ ही शादी करना चाहती थी। मैं दिल और देह दोनों मोहित को दे चुकी थी। जिस लड़के से मेरी शादी हुई, मैं उसके साथ खुश नहीं रह पाई।

उम्मीद है आपको मेरी कहानी पसन्द आयी होगी। अपने सुझाव, शिकायते, प्यार मुझे मेल करते रहें।

rship425@gmail.com

News Reporter

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