Chut Lund Ki Anokhi Duniya-3
Chut Lund Ki Anokhi Duniya-3

              Chut Lund Ki Anokhi Duniya-4

शालू कुछ नहीं बोली, उसकी आंखों में खुशी और संतुष्टि के आँसू थे।
बाबा जी उसकी भावना समझ गए और उसके कान में बोले- पगली, बाबा तीन महीने बाद फिर आयेंगे… पर तुम यहाँ से जाते ही अपने पति के साथ एक बार जरूर सम्बन्ध बना लेना.. वरना उसे शक हो जाएगा.
शालू कुछ बोली नहीं, बस उसने हाँ में सिर हिला दिया।

बाबा जी तीन साल लगातार आते रहे, शालू को तीन संतानों की प्राप्ति हुई पर फिर वो किसी बाहर देश चले गए और शालू बेचारी फिर अकेली रह गई। और आगे के इन सालों में तो जैसे शालू ने खुद को औरत मानना ही छोड़ दिया था, पर आज विवेक के मर्दाना लिंग को देख उसकी भावनाएं फिर जाग गई थी, शालू को सारी रात नींद नहीं आई, रात भर बस करवटें बदलती रही।

दूसरी तरफ विवेक आने वाली घटनाओं से बेखबर सो रहा था, सुबह कोई 6 बजे उसकी नींद खुली तो उसे हैरानी हुई कि आज माँ ने उसे जगाया नहीं पर उसे लगा कि माँ पक्का उसे जगाने आई होगी और वो जागा नहीं होगा.
‘आज तो पिटाई पक्की…’ उसने मन में सोचा और भाग के सीधा रसोई में गया, इस बात से बिल्कुल अनजान कि उसका तम्बूरा अभी भी तना हुआ है और उसकी निक्कर से साफ़ पता चल रहा है. वैसे उसे पता भी होता तो भी वो यही सोचता कि मालिश से उसका लंड कितना ताकतवर हो गया है, उसे इसमें शर्म की कोई बात नज़र नहीं आती।

रसोई में शालू बर्तन धो रही थी और शालू की पीठ उसकी तरफ थी. नाइटी में से उसकी सुडौल गांड साफ़ नज़र आ रही थी.
शालू की मांसल गांड देखते ही विवेक का मन आया कि वो ज़ोर से दबाये इस उभरी हुई चीज़ को!

वो अभी अपने सपनों में ही खोया हुआ था जब शालू को लगा कि उसके पीछे कोई खड़ा है, वो पीछे घूमी तो विवेक की उभरी हुई निक्कर को देख उसकी हँसी छूट गई.
‘उठ गया… सो लेता कुछ देर और!’ वो मुस्कुराते हुए बोली।
‘सॉरी माँ, आज मैं उठ नहीं पाया, मैं अभी सारा काम कर देता हूँ.’ वो डरते हुए बोला।

‘हम्म… काम तो तू कर ही लेगा, यह तो मैं देख ही रही हूँ… और डर मत, आज मैंने खुद नहीं उठाया तुझे!’ शालू ने विवेक के उठे हुए लंड को घूरते हुए कहा और फिर कुछ देर रुक कर बोली- राहुल, तू निक्कर के अंदर कच्छा क्यों नहीं पहनता?
‘मुझे गर्मी लगती है और मेरा नुन्नु दुखता है कच्छे में!’ विवेक ने मासूमियत से जवाब दिया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि माँ उसे कच्छा पहने को क्यों कह रही है.
‘अच्छा पर अब तू बड़ा हो गया है न इसलिए… कच्छा न पहना गन्दी बात होती है.’ शालू बोली।

शालू ने उसे वहीं खड़ा रहने को कहा और अपने कमरे से अपने पति का एक कच्छा ले आई और विवेक को देते हुए बोली- ले पहन ले इसे!
विवेक ने भी बिना किसी शर्म के निक्कर शालू के सामने ही उतार दी और उसका तनतनाता लंड शालू को सलामी देने लगा. विवेक ने कच्छा पहन लिया पर उसका लिंग था ही इतना बड़ा और ऊपर से तना हुआ झट से कच्छे के छेद (जो पेशाब करने के लिये बना होता है) से बाहर आ गया.

‘माँ, मेरा नुन्नु तो कच्छे में आ ही नहीं रहा, क्या करूँ?’ विवेक परेशान होते हुए पूछा.
‘रुक मैं सिखाती हूँ कि कैसे पहनते हैं… नुन्नु को ऐसे पकड़ के कच्छे की टांग वाली तरफ कर देते हैं.’ शालू ने इशारे से समझाते हुए कहा।
विवेक ने दो तीन बारी कोशिश की पर बेकार… ऊपर से लंड दुखने लगा वो अलग!

‘माँ मुझे नहीं आता!’ उसने आखिर थक कर कहा।
शालू समझ गई कि उसे ही अब इस अजगर को संभालना होगा. यह सोचते ही उसके पूरे बदन में सिहरन दौड़ गई।
शालू विवेक के पास गई और उसने विवेक के लंड को पकड़ लिया ‘हे राम कितना मोटा है’ शालू ने मन में सोचा और ये सच ही था, लंड उसकी मुट्ठी में आ ही नहीं रहा था, 2 उंगली जितनी जगह खाली थी।

शालू का मन तो कर रहा था कि अभी इसी वक़्त यह मूसल उसकी फ़ुद्दी में घुस जाये पर वो जानती थी कि सभी घर पे हैं इसलिए उसने जल्दी से विवेक को बताया कि नुन्नु को कहाँ रखते है कच्छे में।
और उसे जल्दी से निक्कर पहनने को कहा.

‘माँ देखो नुन्नु अभी भी नंगा है,’
‘बेटा ये ऐसे ही होता है, तू निक्कर पहन ले तो नंगा नहीं रहेगा.’ शालू ने विवेक से कहा जो कच्छे की टांग से बाहर झांक रहे अपने लिंग की तरफ इशारा कर रहा था।
‘चल जाकर नहा ले, ज्यादा बातें मत बना वरना स्कूल के लिए लेट हो जायेगा.’

सब बच्चों को स्कूल और फिर पति को दुकान भेजने के बाद शालू घर की साफ़ सफाई में लग गई, कोई 11 बजे वो घर के सब काम करके फ्री हुई तो उसने अपनी निशा की माँ को आवाज़ लगाई- अरे निशा की मम्मी, अगर काम निपट गया हो तो आओ चाये पीते हैं… ‘शांति’ भी बस शुरु होने वाला है.
‘आई रमा!’ तरनजीत ने जवाब दिया।

तरनजीत 35 साल की भरे बदन की महिला थी, उसका रंग पंजाबियों की तरह साफ़ और कद काठी काफी मजबूत थी। तरनजीत काफी रंगीन मिज़ाज की औरत थी, शादी के बाद भी उसके कई मर्दों के साथ सम्बन्ध थे।

तरन अपने मोटे कूल्हों को मटकाती हुई शालू के कमरे में दाखिल हुई, उसने शालू के चेहरे को देखते की जान लिया कि शालू के साथ रात को क्या हुआ होगा।
‘क्या रमा, आज फिर भाई साहब फुस हो गए?’ उसने शालू को आँख मारते हुए पूछा.
‘क्या बताऊँ दीदी इस आदमी से तो तंग आ गई हूँ, मैं आज तो पूरे 93 दिन हो गए.’ शालू ने तरन की तरफ चाय का कप बढ़ाते हुए कहा।

‘शालू तू क्यों इस आदमी के साथ क्यों बरबाद हो रही है, जैसे लहसुन बिना सब्जी नहीं जचती वैसे ही लौड़े बिना औरत की ज़िन्दगी ही क्या!.’ तरन ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा.
‘दीदी तुम कह तो सही रही हो… पर मैं कर ही क्या सकती हूँ?’
‘शालू तुम भाईसाहब को किसी अच्छे डॉक्टर को क्यों नहीं दिखाती? आज हर बिमारी का इलाज है… मैं एक दिन भी चुदाई के बिना नहीं रह सकती… तू पता नहीं कैसी जीती है?’
‘दीदी अब क्या कहूँ तुमसे, ये किसी डॉक्टर के पास जाते नहीं… पर मैंने सोचा शरमाते होंगे तो इन्हें बिना बताये ही कई डॉक्टरों की दवाई ले आती थी और इनके खाने में मिला देती थी पर कोई लाभ नहीं हुआ. मैं तो पूरी तरह से टूट चुकी हूँ. तुम ही बताओ क्या करूँ मैं?’ शालू ने सिसकते हुए कहा।

‘ओह शालू हिम्मत मत हारो.. तुम बुरा न मानो तो एक तरकीब है मेरे पास कहो तो बताऊँ?’ तरन ने शालू को सहलाते हुए कहा.
‘दीदी तुम्हारी किसी बात का बुरा माना है आज तक जो अब बुरा मानूँगी.’ शालू ने आस की नज़रों से तरन की ओर देखते हुए कहा।
‘शालू तू मेरे देवर रवि को तो जानती हैं न? बहुत पूछता है तेरे बारे में… मेरी मिन्नतें कर रहा है साल भर से कि तेरी उससे बात करवा दूँ, तू बोले तो करूँ बात?’ तरन ने शालू को आँख मारते हुए कहा।
‘नहीं नहीं दीदी रहने दो!’ शालू ने घबराते हुए कहा.

‘क्यों तुझे अच्छा नहीं लगता क्या?’ तरन सवालिया नज़रों से शालू को घूरते हुए कहा.
‘नहीं दीदी, वो बात नहीं, रवि जैसा सुन्दर और जवान लड़का जिस लड़की को मिलेगा, उसकी तो ज़िन्दगी बन जायेगी… पर वो अभी लड़का है कालेज में पढ़ता है… उसकी जिंदगी खराब हो जायेगी.’ शालू ने उत्तेज़ित होते हुए कहा.

‘हा हा रमा, मैं तो तुझे चालाक समझती थी, तू तो बिल्कुल भोली है बच्चों की तरह… जिसे तू लड़का कह रही है न, वो लड़का तेरी मेरी जैसी चार की चुदाई एक साथ कर सकता है.’ तरन ने हँसते हुए कहा.
‘क्या दीदी, तुम तो कुछ भी कहती हो!’ शालू तरन को हल्का धक्का देते हुए कहा पर तभी वो सारा मामला समझ गई और हँसते हुए- तो इसका मतलब तुम और रवि करते हो?
‘शालू तू करने की बात करती है मैं तो लगभग रोज़ उससे चुदती हूँ, अब ऐसी आदत पड़ गई है कि अगर एक दिन भी उसका लौड़ा न लूँ तो मेरी चूत की हालत बुरी हो जाती है.’
‘ओह दीदी तो कल जब दिन में रवि आया था तो तब भी तुमने… अब समझी तभी कल तुम मेरे पास नहीं आई… पर अगर निशा के पापा को पता चल गया तो? तुम्हें डर नहीं लगता?’ शालू ने हैरान होते हुए पूछा.
शालू मन ही मन सोच रही थी कि ऐसा देवर काश उसे मिला होता.

‘शालू तू विश्वास नहीं करेगी, कल तो निशा के पापा ने सारा खेल देख ही लिया होता पर रवि के ही तेज़ दिमाग ने बाल-बाल बचा लिया.’
‘क्यों क्या हुआ बताओ न?’ शालू बोली उसे अब मजा आने लगा था जैसे हमें पोर्न देखते हुए आता है।
‘हम्म… मजा ले रही है?’ तरन ने शालू को छेड़ते हुए कहा फिर वो पालथी मार के बैठ गई और सुनाने लगी.
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‘शालू क्या बताऊँ तुझे, कल तो एक पल के लिए मेरी सांसें ही रुक गईं थी. हुआ ये कि रवि आम तौर से 10 बजे के आसपास आता है और 1 बजे तक चला जाता है, उसे घंटी न बजानी पड़े इसलिए मैं दरवाजे पर कुण्डी नहीं लगाती… पर कल वो 11 बजे तक नहीं आया मुझे लगा कि अब नहीं आएगा तो मैं रसोई में खाना बनाने चली गई. मैं आटा गूंथ रही थी कि उसने मुझे पीछे आकर दबोच लिया कस के और मेरे कबूतरों को मसलने लगा। मैंने कहा भी ‘क्या कर रहे हो, निशा के पापा आ जाएंगे.’ पर उस पे तो ठरक हावी थी, उसने झट से मेरी नाइटी ऊपर की और घुसा दिया अपना बड़ा मोटा लौड़ा मेरी चूत में… उम्म्ह… अहह… हय… याह… कमीने का इतना मोटा है कि हर बार लेते हुए मेरी हालत पतली हो जाती है।
मैंने कहा भी रवि से कि तेल-वेल लगा ले पर उसने तो तब तक रेल चलानी शुरू कर भी दी थी.
मैं शेल्फ पे झुकी हुई थी और वो मेरे कबूतरों को पकड़ के पूरी ताकत से धक्के दे रहा था।
पर तभी घंटी बजी पर मैं करती क्या मेरी तो सिटी-पिटी गुम हो गई, ‘रवि पक्का तुम्हारे भैया होंगे’ पर उसे तो जैसे पहले ही सब पता था, बोला ‘पूछो कौन है’ और भाग कर बाथरूम में चलो.
मैंने आवाज लगाई ‘कौन है’ और भाग कर बाथरूम में पहुँच गए हम दोनों।
बाहर से ये बोले ‘मैं हूँ तरन दवाजा खोल!’
मैं जो पहले डरी हुई थी, और डर गई, मेरा पूरा बदन कांप रहा था, कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या जवाब दूँ। पर रवि ने धीरे से मेरे कान में कहा कि कहो ‘मैं नहा रही हूँ.. आती हूँ’, मैंने ऐसा ही किया।
रवि मुझ से ज्यादा चालाक था, उसने इतनी सी देर में सब सोच लिया था, उसने झट से मेरी नाइटी उतारी और पानी से मुझे भिगो दिया और तौलिया मुझे देते हुए बोला इसे लपेट लो और जाकर दरवाजा खोलो।
मैंने तोलिया लपेटा और जाकर दरवाजा खोला।
मैं अभी भी डर रही थी कि निशा के पापा गुस्सा होंगे पर भगवान कि दया से ऐसा कुछ नहीं हुआ।
मुझे तौलिए में देख कहने लगे कि तुझे इतनी भी क्या जल्दी थी दरवाजा खोलने की… आराम से कपड़े पहन कर खोलती।
उनकी बात सुन कर मेरी जान में आई, मक्खन लगाने के लिए मैंने उनसे कहा कि आपको इंतज़ार करना पड़ता इसलिए ऐसे आ गई।
उनको बस कुछ कागज़ लेने थे दफ्तर के, उन्होंने वो लिए और चले गए।
उनके जाने के बाद हमने अपना अधूरा काम बड़े आराम से पूरा किया।’ तरन ने अपनी बात खत्म की।

‘ओह दीदी तुम्हारे तो मज़े हैं पर देवर से चुदते हुए तुम्हें बुरा नहीं लगता?’ शालू बोली.
‘शालू तू किस जमाने में रह रही है, आज के जमाने में कोई रिश्ता नहीं होता, बस चूत और लंड होते हैं… वैसे लंड तो अपने विवेक का भी बड़ा मस्त है.’ तरन ने चटकारा लेते हुए कहा.
‘हाय राम तुम कैसी बातें करती हो… विवेक तो अभी बच्चा है, उसे तो छोड़ दो यार!’ शालू ने कहा वो सोच रही थी कि तरन कितनी बड़ी चुदक्कड़ है, उसके बेटे पर भी नज़र है उसकी।
‘नहीं विवेक सिर्फ और सिर्फ मेरा है!’ उसने खुद से कहा।

‘मैं कैसे बातें कर रही हूँ? सारी मोहल्ले की औरतों की नज़र है विवेक पे, तू उसे कच्छा तो पहनाती नहीं और विवेक सारा दिन अपना हथौड़े जैसा लंड लिए इधर उधर घूमता रहता है… कसम खाकर कहती हूँ, अच्छा मौका है तेरे पास… इससे पहले कि कोई पराई औरत तेरे कुंवारे लड़के को मर्द बनाए, तू खुद ही ऐसा कर ले!’ तरन ने शालू को आँख मारते हुए कहा।
‘क्या दीदी, कुछ भी बोलती हो? विवेक मेरे बेटे जैसा है!’ शालू बोली.
‘बेटा तो नहीं है न? और इतना ही बेटा मानती हो तो उसे नौकरों की तरह क्यों रखती हो? फिर बेटा नहीं माँ के दुख दूर करेगा तो क्या दुश्मन करेंगे?’ तरन ने प्यार भरी आवाज़ में शालू से कहा।
‘बोल तो तुम सही रही हो… मैंने उसके साथ बड़ा बुरा बरताव किया है पर दीदी मेरा दिल नहीं मानता.. उसका लंड देख लेती हूँ तो सारे बदन में आग लग जाती है पर..’

‘पर वर छोड़ रमा, कसम खाकर कहती हूँ कि कुंवारे लौड़े का मज़ा अलग ही होता है.’ तरन ने शालू के दिल को टटोलते हुए कहा। वो जानना चाहती थी कि आखिर शालू के दिमाग में चल क्या रहा है। वो तो शालू के जरिये विवेक तक पहुँचने की बात सोच रही थी पर वो बेहद चालाक थी उसे पता था कि वो सीधे कभी विवेक को नहीं पा सकती इसिलए वो शालू को गर्म कर रही थी।

‘दीदी ये क्या कह रही हो रिश्तों में यह सब ठीक नहीं होता’ शालू ने संभलते हुए कहा।
‘साली कितना नाटक करती है.’ तरन ने मन में सोचा। वो जानती थी कि शालू कई महीने से सम्भोग नहीं कर पाई है और बस थोड़ा और उकसाने की देर है फिर यह रवि से भी चुदेगी और अपने बेटे से भी।
‘शालू रिश्ते तो होते ही हैं हमें सुख देने के लिए… और सोच तू कहीं बाहर चक्कर चलाये तो बदनामी का डर है ऊपर से अगर विवेक को भी बाहर चुदाई की लत पड़ गई तो बेचारा कहीं का नहीं रहेगा. तू मोहल्ले की औरतों को नहीं जानती, बड़ी बुरी नीयत है उनकी!’ तरन ने तरूप का इक्का चला।
और उसका वार सही जगह जाके लगा।

शालू सोचने लगी कि बात तो यह सही कह रही है, अगर वो विवेक के साथ अपनी प्यास बुझाती है तो घर की बात घर में ही रह जायेगी।
‘ठीक है दीदी देखती हूँ… पर तुम बताओ क्या तुम कभी घर में चुदी हो?’ उसने अपना बचा-खुचा शक मिटाने के लिए तरन से पूछा।
‘मेरी तो पहली ही चुदाई अपने ही घर में हुई थी और देखो किसी को कुछ पता नहीं चला!’ तरन ने उसे कहा।
‘दीदी, बताओ न कैसे किया तुमने ये सब और किसके साथ?’

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