Bivi Ki Chudai  Maina Ka Ghonsla, Chuda Mera Honsla – Part 2
Bivi Ki Chudai Maina Ka Ghonsla, Chuda Mera Honsla – Part 2

Bivi Ki Chudai | Maina Ka Ghonsla, Chuda Mera Honsla – Part 1

दो दिन से आपको मेरी सेक्स की स्टोरी पढने को नहीं मिल पाई, तो आज दो दो पार्ट पढ़िये और मजे करिए!

संजीव ने दरवाजा खोला और बच्ची दौड़ते हुए अंदर गयी और थोड़ी देर में एक नया खिलौना हाथ में ले वापिस दरवाजे से बाहर निकल गयी. उन्होंने फिर से दरवाजा बंद किया. मैं बाथरूम से निकल कर फिर हॉल में आ गयी.

हम दोनों की नजरे फिर से मिली और अभी जो कुछ भी हुआ था, ये सोच मैंने अपनी नजरे नीचे झुका ली. मैंने सोचा शायद इनका जमीर भी जाग जाए और अपना इरादा बदल ले.

पर एक महीने भर से तड़पते हुए मर्द को अगर मौका मिला हो तो वो भला कैसे छोड़ेगा.

उन्होंने मुझे अपनी गोद में उठा लिया था. वो मुझे बेडरूम में ले गए. मुझे आईने के सामने खडी किया और नीचे से गाउन पकड़ कर उठाते हुए मेरे सर से बाहर निकाल दिया. उन्होंने मुझे उठाया और बिस्तर पर उल्टी लेटा दिया.

उन्होंने एक दराज से कुछ सामान निकाल लिया. अब वो मेरे करीब आये और मेरी दोनों नाजुक कलाइयां पकड़ी और उनको पीठ पर ले जाकर उन पर एक हथकड़ी बाँध ली. उस पर मखमल का कपडा चढ़ा था तो चुभ नहीं रही थी.

मुझे समझ नहीं आया वो करना क्या चाह रहे थे. मैं कोई विरोध नहीं कर थी फिर इस हथकड़ी का क्या फायदा.

उन्होंने मुझे अब सीधा लेटा दिया और अपने हाथ में एक लंबी सी पंखनुमा चीज पकड़ ली. मुझे लग गया वो मुझे गुदगुदी करने वाला हैं.

वो अब उस पंखे को मेरे निप्पल के घेरो के चारो तरफ हलके से फेरने लगा. मजे के मारे मेरी सिसकियाँ निकलने लगी. मेरी चूंचिया एकदम से तन गयी और फुल कर और बड़ी हो गयी.

मैना ने मुझसे एक दो बार जिक्र भी किया था, कि उसके पति सेक्स से पहले कुछ गेम खेल कर तड़पाते हैं, आज पता चला वो खेल क्या हैं. जो भी हो आज उसके हिस्से का खेल मैं खेल रही थी.

अब वो पंख घेरा बढ़ाते हुए मेरे पुरे मम्मो को गुदगुदी कर तड़पाने लगा. इतना रोमांटिक पति होते हुए उसको छोड़ कर जाने वाली कोई बेवकूफ पत्नी ही हो सकती हैं. पंख घूमते हुए अब मेरे नाभी और पतली कमर को गुदगुदाने लगा.

मैं अब इंतज़ार कर रही थी कि जब ये मेरी चूत पर अठखेलियां करेगा तब कैसा लगेगा.

इससे पहले की मैं उस उन्माद में सो जाऊ, डोरबेल एक बार फिर बजी और मैं उस नशे से बाहर आयी.

संजीव ने अपने सारे सामान फिर से दराज में डाले और मुझ पर एक रजाई पूरी डाल दी. ऐ.सी. से वैसे ही हलकी ठंड थी तो रजाई से थोड़ी गर्माहट मिली.

संजीव बाहर जा चुके थे और किसी महिला से बात कर रहे थे. थोड़ी देर में वो दोनों बैडरूम की तरफ बढ़ रहे थे. मेरी हालत ख़राब हो गयी, कही किसी को शक तो नहीं हो गया.

मुझे वो आवाज पहचानते देर नहीं लगी, वो मैना की ही आवाज ही थी. बातों से ऐसा लग रहा था जैसे वो अपने बचे हुए कपडे लेने ही आयी थी. मेरी हालत उस वक्त क्या थी ये कोई सोच भी नहीं सकता.

मैं अपनी सहेली की गैरमौजूदगी में उसके बैड पर नंगी लेटी हुई थी, और उसके छोड़े हुए पति के साथ कुछ अनैतिक काम कर चुकी थी.

मैं सोच में पड़ गयी, क्या मुझे आवाज लगा देनी चाहिए. इससे मैं तो बच जाउंगी इस पाप को और आगे बढ़ने से पहले. पर फिर सोचा मैना पर क्या बीतेगी. उसका अपने पति पर रहा सहा भरोसा भी टूट जायेगा. उसके दोनों बच्चो का क्या होगा.

किसी और को अपने बिस्तर पर सोया हुआ देख उसने संजीव को पूछा भी था, पर संजीव ने झूठ बोल दिया कि वो उसकी माँ हैं, सो रही हैं.

मैना का तो वैसे भी उसकी माँ से छत्तीस का आंकड़ा था, तो शायद वो थोड़ी ही देर में वहा से चली गयी थी. क्यों कि आवाजे आना बंद हो गयी थी.

मैं रजाई के नीचे अभी भी इंतज़ार कर रही थी, कि अचानक मेरे ऊपर से वो रजाई हटा दी गयी. मैं डर गयी, कही सामने मैना न खड़ी हो. पर सामने संजीव को देख थोड़ी शांती मिली.

उसने बताया कि मैना आई थी अपने कपडे लेने और मेरा पहना हुआ गाउन भी लेके चली गयी. जो संजीव ने नीचे से उठा कर अंदर अलमारी में छुपा दिया था बाहर जाने से पहले.

मैंने फैसला कर लिया था कि मैं अब और वहा नहीं रुकने वाली. तब तक वो एक बार फिर वो पंख ले आया और मेरे शरीर पर फेरने लगे. उसमे पता नहीं क्या जादू था कि मुझे अपना फैसला फिर से बदलना पड़ा.

शायद संजीव के पास भी ज्यादा समय नहीं था, मुझे ज्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ा. वो नाजुक पंख मेरी चूत को सहला रहा था और मेरी चूत मजे के मारे कांप रही थी. मेरे मुँह से आह आह की आवाजे आने लगी.

मेरे पैर अपने आप ही एक दूसरे से दूर होते गए और मैंने अपनी चूत के दरवाजे खोल दिए. मुझे बस ये अहसास हो रहा था कि मैं किसी मसाज पार्लर में हूँ और सुकून भरी मसाज करवा रही हूँ. मेरी चूत में बूंद बूंद पानी भरने लगा था और छलकने को उतारू था.

इससे पहले की मेरी चूत का जाम छलक जाए, वो रुक गए और मुझे पलटी मार कर उल्टी लेटा दिया. वो अब दराज से कुछ और निकालने लगे.

तभी एक जोर की चटाक आवाज सुनाई दी और मैंने अपनी गांड पर किसी ने मारा हो ऐसा महसूस किया. उसके कुछ सेकंड्स बाद मुझे वहा हलकी जलन होने लगी जो कुछ सेकंड रही.

मैंने सर पीछे कर देखा संजीव के हाथ में एक पतली छड़ी जैसा था जिस के आगे के सिरे पर चमड़े का छोटा टुकड़ा लगा था.

अब उन्होंने मेरे गांड के दूसरे गाल पर मारा, फिर वही चटाक की आवाज और हलकी जलन. जिसके बाद पुरे शरीर में कंपन सा हुआ.

मेरे पुरे शरीर में रोंगटे खड़े हो गए और खास तौर से मेरी चूत में एक अजीब सी खुजली मचने लगी. ऐसा महसूस हुआ जैसे कोई आये और मेरे अंगो को हाथ लगा कर सहलाये.

थोड़ी थोड़ी देर से वो मुझे ऐसे ही चटाके मारता रहा और मेरे मुंह से कराहने की आवाज के साथ एक प्यास भरी आह निकलती.

एक लड़के ने अपने दोस्त की मम्मी यही की अपनी रीता चाची की चुदाई कैसे करी. यह आप उसकी सेक्स की स्टोरी में जान सकते है.

जब उसने चटाके मारना पूरा बंद कर दिया, तब मुझे अहसास हुआ कि मेरी गांड पर जहा जहा पड़ी एक साथ हल्का दर्द सा हो रहा था.

वो दर्द थोड़ी देर बाद सामान्य हो गया, क्यों कि वो इतनी जोर से भी नहीं मारा था कि बहुत ज्यादा देर तक रहे. उसने मेरे हाथों से हथकड़ी खोल दी.

मुझे लगा कही इसी कारण से तो मैना इसको छोड़ कर नहीं चली गयी. पर इसमें इतना बुरा भी नहीं था. अगर ज्यादा जोर से ना मारा जाए तो ये औरत को और भी ज्यादा उकसाने के काम आ सकता हैं. मैंने तो सोच लिया था कि मैं भी अपने पति को ऐसी चीज लाने को बोलूंगी, वरना हाथ से भी चांटे मार कर काम चला सकते हैं.

मेरी चूत अब फड़फड़ा रही थी. कभी चूत की पंखुडिया सिकुड़ती तो कभी फूल कर खुल जाती.

मैं अब आबरू, नफरत, दया सब भूल चुकी थी, मैं अपने शरीर की जरुरत के आगे लाचार हो चुकी थी. पति ने वैसे भी पिछले एक सप्ताह से मुझे कोई शारीरिक सुख नहीं दिया था.

वो अपने कपडे उतार कर मेरे पास में लेट गए. शायद इतनी मेहनत के बाद थोड़ा आराम करना चाहते थे. मैंने देखा उनका लंड फुँफकार मार रहा था और रह रह ऊपर नीचे हो सलामी दे रहा था.

उनके हाथ में एक कंडोम का पैकेट था. उन्होंने वो कंडोम खोल अपने लंड को पहना दिया.

फिर उन्होंने मुझे अपनी तरफ खिंच कर मुझे अपने आप पर झुका दिया. मैं जैसे उन पर सवार हो गयी. मेरा थोड़ा शरीर उन पर झुका हुआ था. मेरे दोनों मम्मे उनके मुख पर थे.

वह अब मेरी चूँचियो को धीरे धीरे चूसने लगे. साथ ही साथ वो अपने दोनों हाथ मेरे कमर और नितंबो पर फेरने लगे.

उनका लंड नीचे से बार बार खड़ा हो कर मेरी चूत पर चांटे मार रहा था, जिसके छूते ही मुझे करंट सा लगता. मेरे शरीर में झुरझुरी छूट जाती.

थोड़ी देर इसी तरह चलता रहा. अब उन्होंने अपना लंड पकड़ कर मेरी चूत में डाल दिया. वो मेरे कूल्हे पकड़ कर मुझे आगे पीछे हिलाते हुए मेरी धक्का मशीन चालू कर रहे थे.

एक बार मजा आना चालू हुआ तो मैं उनके हाथ छोड़ने के बावजूद अब खुद ही झटके मारने लगी. अब मैं तेजी से आगे पीछे होते हुए अपने बदन से उनके बदन को रगड़ रही थी.

मेरे मम्मे उनके सीने से रगड़ खाकर और मजा दे रहे थे. थोड़ी ही देर में हम दोनों की आहें एक साथ निकलने लगी. मैं अपने चरम की और बढ़ रही थी. मैंने उन्हें कस कर पकड़ लिया था.

आह्ह्ह आह्ह आह्ह ओह्ह्ह यस्स्स्स उम्म उँह उँहह्ह्ह्ह आह्ह्ह आईईईइ हम्म्म्म की आवाज के साथ और कुछ हल्के धक्को के साथ अपना काम पूरा किया.

उनका अभी भी पूरा नहीं हुआ था. इसलिए थकी होने के बावजुद मैंने करना जारी रखा. पर थोड़ी ही देर में मैं थक कर रुक गयी.

अब वो नीचे लेटे लेटे ही अपने लंड को मेरे शरीर में अंदर बाहर करने लगे. मुझे फिर मजा आने लगा. थोड़ी देर में मैंने भी साथ देते हुए थोड़ा जोर लगाया.

जिससे मेरा मूड एक बार फिर बनने लगा. शायद ये सारा जादू उस खेल का हैं जो उन्होंने मेरे साथ खेला था. मैं वो पंख अभी भी अपने मम्मो और चूत पर फिरते हुए महसूस कर पा रही थी.

मैंने रुक रुक कर जोर से झटके मारने शुरू किये. मेरा थोड़ा पानी तो पहले ही निकल चूका था तो उन झटको से फच्चाक फच्चाक की आवाजे आने लगी.

हम दोनों एक दूसरे की विपरीत दिशा में एक साथ झटके मार रहे थे, जिससे उनका लंड और मेरी चूत एक दूसरे की तरफ तेजी से बढ़ते हुए एक दूजे में समा रहे थे, और झटको का वेग और भी बढ़ने से लंड गहराई में उतर रहा था.

उनकी आहें अब और भी लंबी होने लगी और आवाज भी बढ़ने लगी. अब उन्होंने जोर लगाना बंद कर दिया था शायद उनका होने वाला था. इसलिए मैंने अपना पूरा जोर लगाते हुए करना जारी रखा.

जल्द ही उनकी चीख निकली और मुझे अपने सीने से चिपका कर अंदर की ओर कुछ हलके धक्के देने लगे.

अब तूफ़ान शांत हो चूका था. मैं अपनी चूत से थोड़ा पानी रिसता हुआ महसूस कर रही थी. शायद मैंने ही दूसरी बार झड़ने के करीब होने से पानी छोड़ा होगा.

शारीरिक जरुरत पूरी होने के बाद ही इंसान को अपने सारे गुनाह नजर आते हैं. हम दोनों का हो तो गया, पर मन ही मन में पता था कि हमने क्या गलती कर दी हैं जिसका कोई प्रायश्चित भी नहीं हैं.

थोड़ी देर उसी मुद्रा में सोये रहने के बाद मैं उनसे नीचे उतर गयी. जो मैंने देखा उस पर यकीन नहीं कर पायी. मैंने देखा उनका कंडोम फट चूका था. इसका मतलब उनका सारा वीर्य मेरी चूत में जा चूका था. वो जो पानी रिसा था वो मेरा नहीं संजीव का था.

ये मेरे महीने के सबसे खतरनाक दिन चल रहे थे, जब बच्चा होने की सम्भावना सबसे ज्यादा होती हैं. शायद वो कंडोम नहीं मेरी किस्मत फटी थी.

वो उठे और कपडे पहन कर बाहर चले गए. मेरा गाउन तो जा चूका था, मेरे कपडे बाहर ड्रायर में थे तो ऐसे ही बैठ मैं इंतज़ार करने लगी. थोड़ी ही देर में वो लौट आये, उनके हाथ में मेरी ड्रायर में सुख चुकी लेगिंग कुर्ता थे. मैंने उनसे वो कपडे ले लिए.

कपड़ो के बीच में वो मेरे अंतवस्त्र छुपा कर लाये थे मेरी ही स्टाइल में. जो की मेरी लापरवाही से फिर नीचे गिर पड़े. मैं एक बार फिर शर्मिंदा हुई. उन्होंने झुककर तुरंत वो कपडे उठाये और मुझे थमा दिए.

अब उनको यह अधिकार था कि वो इन वस्त्र को भी छु सकते थे. वो बाहर चले गए और मैं फिर उसी अलमारी के पास खड़ी हो कपडे पहनने लगी.

दरवाज़ा अभी भी खुला था, पर अब मुझे परवाह नहीं थी. छुपाती भी क्या? सब कुछ तो दे ही चुकी थी. बाहर देखा तो वो सोफे पर बैठे मुझे ही कपडे पहनते देख रहे थे. शायद वो पहले वाला साया सच्चाई ही था.

मैं अब बाहर हॉल में आ गयी थी और उनसे जाने की इजाजत मांगी. वो मेरे पास आये और अपने हाथ में मेरा हाथ लेकर मुझे धन्यवाद करने लगे. अपनी आदत के अनुसार मेरे मुँह से वेलकम निकल गया.

अपनी इस आखिरी गलती पर मैंने अपनी जुबान दाँतों से काट ली. तुरंत मुड़ कर उनसे विदा लेते हुए दरवाज़े के बाहर चली गयी.

नीचे उतरते हुए यही सोच रही थी कि क्या मैंने जो भी किया सही था? मैना के पति के लिए निश्चित रूप से सही किया था.

शायद मेरे खुद के लिए भी ठीक ही किया था. मुझे आज एक नया अनुभव हुआ. मैंने कही मैना का घोंसला तो नहीं तोड़ दिया या फिर वो घोसला पहले से ही टुटा हुआ था.

फटे कंडोम को याद कर मेरा मदद करने का हौंसला भी टूट चूका था. पहले ही हिल स्टेशन पर जो अनुज के साथ किया वो काफी नहीं था जो अब ये कांड भी कर बैठी.

चार दिन के बाद मैना का फ़ोन आया, एक बार तो मैंने डर के मारे उठाया ही नहीं, कि कही उसको सब मालुम तो नहीं चल गया.

दूसरी बार आने पर मैंने उठाया, वो मुझे शुक्रिया बोल रही थी. उसके हिसाब से मैंने उसके पति को अच्छे से समझाया जिससे वो माफ़ी मांग कर उसको फिर अपने घर ले आये थे मैना की शर्तो पर.

मुझे बहुत अच्छा लगा कि मेरी इज्जत की कुर्बानी मेरी सहेली के कुछ तो काम आयी. मन में एक अपराध-बोध था वो थोड़ा कम हुआ.
पर मेरी मुसीबत अब दोहरी हो चुकी थी. अगर माँ बनी तो बच्चे का बाप कौन होगा, अनुज या संजीव !

उससे बड़ी मुसीबत अपने पति को क्या जवाब दूंगी कि ये बच्चा किसका हैं? आने वाले दो सप्ताह का इंतज़ार मेरे लिए भारी पड़ने वाला था.

News Reporter

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